“ईमान तब तक मुकम्मल नहीं जब तक अहलेबैत से मोहब्बत न हो” : मौलाना शफीक हुसैन शफ़क
मेमन सादात में अशरा-ए-मजलिस की नवीं मजलिस सम्पन्न
मौलाना शफीक हुसैन शफ़क ने बयान किए अहलेबैत के फ़ज़ायल, मसायब सुनकर रो पड़े अकीदतमंद
कलम हिन्दुस्तानी : पत्रकार शमीम अंसारी
किरतपुर (बिजनौर)। मेमन सादात स्थित इमामबाड़ा साक़ी-ए-कौसर में शनिवार को अशरा-ए-मजलिस की नवीं मजलिस अकीदत और ग़मगीन माहौल में आयोजित की गई। इस अवसर पर सुल्तान उज़ ज़ाकेरीन आली जनाब मौलाना शफीक हुसैन शफ़क साहब (लखनऊ) ने मजलिस को संबोधित करते हुए फ़ज़ायल-ए-अहलेबैत और मसायब-ए-असीराने कर्बला का दिल को छू लेने वाला बयान पेश किया।
मौलाना ने अपने बयान में रसूल-ए-अकरम (स.अ), हज़रत अली (अ.स), जनाबे फ़ातिमा (स.अ), इमाम हसन (अ.स) और इमाम हुसैन (अ.स) की शान और फ़ज़ीलतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कुरआन और अहलेबैत के रिश्ते को बयान करते हुए कहा कि “अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की कसम, दिलों में उस वक़्त तक ईमान दाखिल नहीं होगा जब तक मेरे अहलेबैत से मोहब्बत न की जाए।” मजलिस के दौरान जनाब नदीम असगर ज़ैदी ने मारसियाख़्वानी की, जबकि जनाब इसार हैदर ने पेशख्वानी कर श्रद्धा प्रकट की। मौलाना शफीक ने कर्बला की दर्दनाक घटना का तफ़्सील से ज़िक्र करते हुए बताया कि कैसे यज़ीद की फौज ने इमाम हुसैन (अ.स) और उनके वफादार साथियों को शहीद कर दिया, फिर उनके परिवार को कैद करके कूफ़ा और शाम तक ले जाया गया। इन मसायब को सुनकर मजलिस में मौजूद अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं और कई लोग फूट-फूट कर रो पड़े। मजलिस के अंत में डॉ. मरग़ूब आलम कर्बलाई ने नौहाख़्वानी पेश की और मातमी दस्तों ने गहरे मातम के साथ वक्त के इमाम को पुरसा पेश किया। माहौल पूरी तरह से रूहानियत और ग़म में डूबा रहा।
