इन्हेदामे जन्नतुल बक़ी पर मेमन सादात में मजलिस,

मौलाना शहज़ाद अब्बास मोलाई ने सुनाए मसायब और फ़ज़ाइल

कलम हिन्दुस्तानी : शमीम अंसारी

बिजनौर (किरतपुर)। जनपद बिजनौर के कस्बा मेमन सादात में सोमवार 7 अप्रैल 2025 को इशा की नमाज़ के बाद इमामबारगाह साकिये कौसर में मजलिस बा उनवाने “इन्हेदामे जन्नतुल बक़ी” का पुरअसर आयोजन किया गया। इस मजलिस का उद्देश्य इस्लाम के मुहिम और मुक़द्दस तारीखी स्थलों में शामिल जन्नतुल बक़ी की शहादत की याद को ताज़ा करना और उसे शहीद करने वालों के जालिमाना किरदार को उजागर करना था।

          कार्यक्रम की शुरुआत जनाब नईम मोलाई साहब ने अपने हमनवां (साथियों) के साथ मिलकर पुरअसर मरसियाख़ानी से की। उनकी आवाज़ और लहजे ने मजलिस के माहौल को रंजो-ग़म से भर दिया। मरसियाख़ानी के बाद आली जनाब मौलाना शहज़ाद अब्बास मोलाई साहब ने मजलिस को ख़िताब किया। उन्होंने मजलिस को संबोधित करते हुए अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के फ़ज़ाइल (गुणों और विशेषताओं) को बड़े ही प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया, जिसे सुनकर मौजूद मोमेनीन ने “वाह वाह”, “सुब्हान अल्लाह” और “लब्बैक या हुसैन” जैसे नारों से वातावरण को गूंजा दिया।

          मौलाना शहज़ाद अब्बास मोलाई ने जन्नतुल बक़ी के मसायब बयान करते हुए कहा कि जन्नतुल बक़ी सिर्फ एक क़ब्रिस्तान नहीं बल्कि इस्लाम की तारीख़ का एक अहम हिस्सा है। उन्होंने अफ़सोस जताते हुए बताया कि किस तरह 8 शव्वाल 1345 हिजरी, यानी 21 अप्रैल 1925 को वहाबी सोच रखने वालों ने इसे शहीद कर दूसरी कर्बला की तस्वीर खींच दी। उन्होंने कहा कि इस अमल ने उनकी यज़ीदी फितरत और उनके अक़ीदे की असलियत को पूरी दुनिया के सामने ला दिया।

        मौलाना ने बताया कि जन्नतुल बक़ी को इसलिए भी मुक़द्दस माना जाता है क्योंकि यहां पर रसूले ख़ुदा (स.अ.) की बेटी जनाबे फातिमा ज़हरा (स.अ.), इमाम हसन अलैहिस्सलाम, इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलाम, इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम, और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम जैसे पांच मासूमीन अलैहिस्सलाम दफ़्न हैं। इसके अलावा यहां जनाबे फातिमा बिन्ते असद और उम्मुल बनीन जैसी मुकद्दस हस्तियों की भी मज़ारें थीं। मसायब के दौरान मौलाना की दर्द भरी आवाज़ और ग़मगीन लहजे ने मोमेनीन के दिलों को झिंझोड़ दिया। मजलिस के अंत में माहौल रंजो-ग़म से भर गया और मोमेनीन की आंखें अश्कबार हो गईं। इस मौके पर लोगों ने जन्नतुल बक़ी के पुनर्निर्माण की दुआ की और इस्लामी विरासत की हिफ़ाज़त की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। मजलिस का समापन दुआओं के साथ हुआ।

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